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नेहरू प्लेस का आवाज़नामा

Mickey Virus 2013

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ज़रूरत है कुछ पल ठहरकर और कान लगा कर सुनने की। गूंज तैयार हो रही है जरा चौकन्ने रहिये। लम्बी-लम्बी लचीली झाडूओं से, जमीन पर पड़े कूड़े को साफ करते कर्मचारी। मोटर साईकिलों, स्कूटर और कार पार्क करते शख़्स अपने दफ़्तरों की ओर जा रहे हैं। सुबह के इस मंजर में दाखिल होते ही जहां पर चारों तरफ से खुले रास्ते और पहली बार अपनी दस्तक देकर सन्नाटे से भरी जगह को तारों -ताजा कर रहे हैं।

नेहरू प्लेस के इस बाज़ार का सवेरा यहाँ की दुकानों के सटर और इस पूरी जगह से कागज़, पोलिथीन, प्लास्टिक चाय के कप, गत्तो के डिब्बे और कपड़ों के बड़े बड़े गट्ठरों के खुलते ही पता चलता है।

इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक समानों के रख – रखाव से दुकानों के बाहर जो ध्वनियाँ घूमती है उनके होने से यहाँ की आबोहवा बनती है।

तिरपाल को खड़ा करते हुए अपने -अपने हिस्से का कोना बनाते लोग। कपड़े, चाइनीज़ खिलौने, बैग की पैकिंग खोल रहे हैं। ये सब पटरी वाले अपनी – अपनी दुकान को व्यवस्थित करने में लगे हैं।

चारों तरफ न्यूज़ चैनलो और गानों की गर्मागर्मी के साथ सांस छोड़ते खिड़कियों पर लगे AC। इनके पुराने होने का पता उनके चलने की आवाज़ से पता चलता है। कागज़ो का फड़फड़ाना, सीढ़ियों के नीचे डिब्बों को खिसकाना और अटकना, पॉलीथिनों का यहां से वहां होना। एक आवाज़ पैदा करते हैं। लग रहा है जैसे एक चीज दूसरी चीज से बातें कर रही है।

आप इस जगह को तकनीकी चीजों की मंडी भी कह सकते हैं। कंप्यूटर और मशीने छोटी-बड़ी, नई-पुरानी, असली- नकली, खमोश, चीखती और अपने होने का अहसास कराती है। हर तरह की चीजों के यहां दाम तय किये जाते हैं और पल-पल बदलते भी रहते हैं।

सजी सवरी एक चाईना बाज़ार के खिलौने की दुकान जहां चाबी से चलने वाला गुड्डा चल रहा है रेडियो ट्रांजिस्टर। हैलीकॉप्टर, हवाईजहाज, रिमोट से चलने वाली कार, नाइट लेंप, क्रैन, रेलगाड़ी, डोरबेल, मच्छर मारने का रैकेट और भी बहुत कुछ ….

इस जगह में इतनी अफ़रातफरी रहती है कि किसी को ठहर कर सुन पाना मुश्किल सा लगता है। मगर खास बात ये है की यहाँ इतनी खींचातानी होने के बाद भी बाज़ार में अपनी तरफ आकर्षित करती ध्वनियाँ यहाँ से गुजरने वालों को पुकारती हैं।

“सॉफ्टवेयर सीडी”

“सॉफ्टवेयर सीडी गेम”

“सॉफ्टवेयर सीडी गेम”

और जब तक उसकी तरफ नज़र चली ना जाये वो पुकारना बंद नहीं होता। मानो ये आवाज़ पीछा कर रही हो। अगर पलट आवाज़ों के इस कौतूहल को सुना जाए तो ये एक प्रसारण के जैसा ही लगेगा।

राकेश

गर याद रहे

Anand (1971)

इंसान जब मरता है तब तमाम तरह के अनुष्ठान होते है: उन्हें दफ़नाया जाता है, तो कहीं जलाते है । फिर फूल चुनने जाते है और अस्थि को एक लोटे में रख देते है। एक साल बाद उस लोटे को गंगा में बहा देते है। दरअसल ये उस ज़माने के रीतिरिवाज है जब आधुनिक तकनीक नहीं थी। इसलिए लोग अपने अज़ीज़ों की काफ़ी दिनों तक अपने पास एक ऐसी चीज़ रखते थे जो उनकी मौत को झुठला सके। लोग राख रखते थे। राख यानि याद के रुप में एक ठोस चीज़ जिसे आप अपने पास संभाल कर रख सकते हो।तस्वीर पर पड़ी माला उसी अनुष्ठान का दृश्य रूपक है।

शोला था जल बुझा हूँ हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएं मुझे न दो।
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फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्यः आवाज़ों से / की भरी- पूरी दुनिया

फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्यः आवाज़ों से / की भरी -पूरी दुनिया

हिन्दी में फणीश्वरनाथ रेणु के संबंध में लिखी कही जाने वाली बातें प्रायः आंचलिकता की बहस के इर्दगिर्द होती हैं। यह बहस अगर बेमानी नहीं तो भी रेणु को समझने के लिए कम से कम नाकाफ़ी तो है ही। सकारात्मक या नकारात्मक अर्थों में आंचलिकता से परे भी उनके यहां बहुत कुछ है जिसका अभी पूरी तरह नोटिस नहीं लिया गया है। आवाज़ों की अपनी विचित्रताओं या अद्वतीयाताओं को पकड़ने की जो हिकमत उनके साहित्य में मिलती है उसकी पर्याप्त सराहना अभी तक इन पंक्तियों के लेखक की निगाह से नहीं गुजरी है। अफसोस कि कुछ लोगों, मसलन रामविलास शर्मा ने उनकी ऐसी हिकमत पर ग़ौर फरमाते हुए उसे ऊबाऊ और व्यर्थ ही पाया है। यह दुःखद और आश्चर्यजनक इसलिए है कि अपने आसपास की दुनिया को बारीकी से जानने पर प्रगतिशील आलोचना का विशेष बल रहा है और अपने बैठकखाने में चाय के प्याले में क्रांति करने की उन लोगों ने हमेशा आलोचना की है। इसके बावजूद आचंलिक स्पंदन और एकदम खांटी, असली अनुभूतियों और आवाजों के आर्काइवर रेणु उनको क्यों नहीं भाते।

आखिरकार, प्रगतिशील आलोचना से कहां चूक हुई है कि अपने आसपास की तमाम ध्वनियों को बहुत ग़ौर से सुनने और दर्ज़ करने वाला लेखक दरअसल ड्राइंगरूमी लेखन से अपने बाहर होने का एक सबूत देता रहा। तमाम तरह की आवाज़ों की अद्वितीयता को रेखांकित करता हुआ वह ज़िंदगी के साथ अपने जिस जुड़ाव का परिचय देता है वह तरक्कीपसंद मिज़ाज को भला नागवार कैसे गुजर सकती है?

रेणु का साहित्य ऐसी आवाज़ों का एक भरापूरा खज़ाना है। यह हिन्दी का ऐसा सबसे समृद्ध उदाहरण है जो आवाज़ों की दुनिया को पकड़ने के मामले में दुनिया भर की कद्दावर भाषाओं के साहित्य से कहीं भी कमतर नहीं ठहरता। इस मामले में रेणु का साहित्य हिन्दी वालों के लिए प्रदशर्नीय नमूना है। Continue reading

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सुनने की शर्त

दीवार 1975

इस सीन में बडे भाई ने छोटे भाई को सुनने के लिए बुलाया है .वो बस सुनने आया है . ऐसा लगता है अपनी तरफ से उसे कुछ नहीं कहना है . उसके शरीर मे इंतज़ार का एक भाव है .लेकिन उसके इंतज़ार में एक बेचैनी है . बेचैनी इसलिए की वो जनता है कि वो क्या सुनने आया है ?बेचैनी इसलिए नहीं की उसे कोई हैरत होने वाली है .गौर करने वाली बात ये है कि वो तब तक नहीं बोलता है जब तक सवाल नहीं पुछा जाता .वैसे भी रिश्तों के सारे पुल टूट चुके हैं .इसी पुल के बहाने सुनने की जगह की तरफ भी अपने भाई को इशारा करता है। अमिताभ कहता है कि ”हम कहीं और नहीं इसी पुल के नीचे ही मिल सकते थे ”.
सुनने की एक जगह भी होती है.जो बात इस बार भाई कहना चाहता है वो यहीं कही जा सकती हैं — और यहीं सुनी भी जा सकती है. एक भरपूर भावुक सेटअप तैयार किया गया है .

पर सुनने का प्रमाण देने के लिए बोलना ज़रूरी होता है. अगर प्रतिक्रिया नही देंगे तो कैसे पता चलेगा की आप सुन रहे हो?
शशी कपूर आपने बॉडी –हाथों से, चाल से ,और नज़र न मिला के वो अपनेको disinterested listener बतला रहा है.

अमिताभ पूछता है/प्रतिक्रिया चाहता है कि सुनने मे भाई को दिलचस्पी है भी की नहीं .वो कहता है कि ”मैं किससे बात कर रहा हूँ .
लेकिन आज ‘दोनों कहना चाहते थे’
‘दोनों सुनाना चाहते थे’ . सुनने के लिए आज कोई नहीं आया।

कौन कहेगा, कौन सुनेगा में एक पारंपरिक हायरार्की तो है ही जो बड़े भाई और छोटे भाई में होती है, शशि कपूर की तलहथियोँ की कसमसाहट उस असंतोष से भी निकलती है। हाथ पीठ पर बँधे हैं, लेकिन सम्मान में नहीं।

सुनने वाले को तैयार करना सुनाने वाले की ज़िम्मेदारी है .

Mr. Natwarlal ( 1979 )

हर जगह जिसको सुनाना है वो सुनने वाले को तैयार करता है। सुनाने वाला सुनने वाले का ध्यान अपनी ओर खींचता है। सुनने वाले के कान खुले हुए है। पूरे वातावरण में जितनी भी ध्वनियां है, जितनी भी आवाज़ें आ रही है वो सुनने वाले के कानों में जा रहा है पर ये जो सुनाने वाला है वो कह रहा है कि सिर्फ़ मेरी ध्वनियां सुनो। वो कहता है सुनने वाले से कि सुनते हुए तुम चुनाव करो कि तुम्हें क्या सुनना है। दरअसल सुनाने वाला चाहता है कि सुनने वाला वही सुने जो मैं कह रहा हूं इसलिए पुराने ज़माने में डुग-डुगी बजाई जाती थी,और अब अनाउंसमेंट होते थे। दरअसल सुनने वाला कुछ भी सुनने को तैयार रहता है लेकिन सुनने वाला सिर्फ़ वही सुनने को तैयार नहीं है जो आप सुनाना चाहते हो। ध्यान रहे कान एक खुला ऑबजेक्ट है, आंखें आप बंद कर सकते हो। कानों को बंद करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा यानी उंगलियां डालनी होती है। इस गाने में बच्चा जब टोकता है – आप तो जिंदा है, आगे भी सुनाओ तो ये कहानी – गाना एक माहौल बनाने में और अपनी ही यादों की दुनिया में घूमने में मदद करता है। बच्चे को ‘फिर क्या हुआ’ इसमें दिलचस्पी है।विहंगम पटल पर एक कविता भी इसी उत्सुकता पर है
फिर क्या होगा उसके बाद
फिर क्या होगा उसके बाद,
उत्सुक होकर शिशु ने पुछा
माँ क्या होगा उसके बाद?
यहां श्रोता मंत्रमुग्ध नहीं है। उसका अपना ज़ेहन है और अपना फोकस। यही दिमाग और यही फोकस कहानीनुमा गीत में एक संवाद की गुंजाईश पैदा करती है।