Monthly Archives: July 2013

फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्यः आवाज़ों से / की भरी- पूरी दुनिया

फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्यः आवाज़ों से / की भरी -पूरी दुनिया

हिन्दी में फणीश्वरनाथ रेणु के संबंध में लिखी कही जाने वाली बातें प्रायः आंचलिकता की बहस के इर्दगिर्द होती हैं। यह बहस अगर बेमानी नहीं तो भी रेणु को समझने के लिए कम से कम नाकाफ़ी तो है ही। सकारात्मक या नकारात्मक अर्थों में आंचलिकता से परे भी उनके यहां बहुत कुछ है जिसका अभी पूरी तरह नोटिस नहीं लिया गया है। आवाज़ों की अपनी विचित्रताओं या अद्वतीयाताओं को पकड़ने की जो हिकमत उनके साहित्य में मिलती है उसकी पर्याप्त सराहना अभी तक इन पंक्तियों के लेखक की निगाह से नहीं गुजरी है। अफसोस कि कुछ लोगों, मसलन रामविलास शर्मा ने उनकी ऐसी हिकमत पर ग़ौर फरमाते हुए उसे ऊबाऊ और व्यर्थ ही पाया है। यह दुःखद और आश्चर्यजनक इसलिए है कि अपने आसपास की दुनिया को बारीकी से जानने पर प्रगतिशील आलोचना का विशेष बल रहा है और अपने बैठकखाने में चाय के प्याले में क्रांति करने की उन लोगों ने हमेशा आलोचना की है। इसके बावजूद आचंलिक स्पंदन और एकदम खांटी, असली अनुभूतियों और आवाजों के आर्काइवर रेणु उनको क्यों नहीं भाते।

आखिरकार, प्रगतिशील आलोचना से कहां चूक हुई है कि अपने आसपास की तमाम ध्वनियों को बहुत ग़ौर से सुनने और दर्ज़ करने वाला लेखक दरअसल ड्राइंगरूमी लेखन से अपने बाहर होने का एक सबूत देता रहा। तमाम तरह की आवाज़ों की अद्वितीयता को रेखांकित करता हुआ वह ज़िंदगी के साथ अपने जिस जुड़ाव का परिचय देता है वह तरक्कीपसंद मिज़ाज को भला नागवार कैसे गुजर सकती है?

रेणु का साहित्य ऐसी आवाज़ों का एक भरापूरा खज़ाना है। यह हिन्दी का ऐसा सबसे समृद्ध उदाहरण है जो आवाज़ों की दुनिया को पकड़ने के मामले में दुनिया भर की कद्दावर भाषाओं के साहित्य से कहीं भी कमतर नहीं ठहरता। इस मामले में रेणु का साहित्य हिन्दी वालों के लिए प्रदशर्नीय नमूना है। Continue reading

word of the week: चिल्ल पों

चिल्ल पों

चीख़-पुकार के नजदीक का शब्द है, पर ये मारपीट या करुणा वाले संदर्भ से अलग है।
चिल्ल पों – यानि आवाज़ों की आपाधापी जिसके ऊपर जाकर आपको अपनी आवाज़ दर्ज करनी है।
चिल्ल पों वाली आवाज़ सत्ता या किसी भी एक शख़्स की तरफ़ केंद्रित या सम्बोधित नहीं होती बल्कि ये आपस में ही उलझी हुई आवाज़ें हैं और इन सारी आवाज़ों की दिशा बेतरतीब होती है। बचपन के संदर्भ में इस शब्द का ज़्यादा इस्तेमाल होता है। ये एक दूसरे पर चढ़ी हुई आवाज़ों का ढेर है।

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चिडि़या बाज़ार

 

      Old Delhi bird market 1

 

00.3 पिंजरे पर लकड़ी मारने की आवाज़- झिन झिन झिन नननन…

00.7 टीवी का गाना गुनगुनाना… बूउम… बूउम बूउउउम

00.07 से 00.18 –  चिड़ियों का बोलना जो कि मिक्स होकर चहचहाने जैसा ही सुनाई दे रहा है… चीं-चीं-चीं-चिरररर-चिरररर-टीटटटीटटीटट, टीवीईईईईक- ट्वीक

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उस्ताद

वहां दाखिल होते ही मन को झनझना देनी वाली आवाज़ों का एक जमघट सा लग गया। दूर से आती हुई  ट्रैफिक की गड़गड़ाहट सायं-सायं करती हुई कानों में जैसे घुसने लगी। आज न ही कोई त्यौहार था और न ही कोई खास दिन। फिर भी यहां आते ही लगा जैसे मैं किसी मेले में हूं जहां कई आवाज़ें एक-दूसरे को जी-जान से दबाने की कोशिश में लगी दिर्खाइ देती हैं। जैसे हर
बड़ा जनरेटर अपनी भयंकर भट-भट से छोटे जनरेटर की ठक-ठक, ठक-ठक को आसपास ही रहने की बन्दिशों में बांध देता है और दूर-दराज से आती दस रुपये में तिलिस्मी जादू दिखाने की ललकार सब पर भारी सी पड़ती है। वैसे ही यहां भट-भट, भटटटटटटटटट।।। करता सायलेंसर, टक-ठक टुक पीइं घड-घड,,,चर-चुर्र-चीईई… पर भारी सा लग रहा था।
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word of the week: कोलाहल

कोलाहल

ये शोर के कड़क रूप के विपरीत एक कोमल शब्द है। ये शब्द कवियों के काफ़ी नज़दीक है। कोलाहल में ढेर सारी आवाज़ों की लयबद्धता होती है और ये कानों को चुभता नहीं है। लेकिन इसमें भी ढेर-सारी आवाज़ों का अस्पष्ट समुच्चय होता है।

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