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गर याद रहे

Anand (1971)

इंसान जब मरता है तब तमाम तरह के अनुष्ठान होते है: उन्हें दफ़नाया जाता है, तो कहीं जलाते है । फिर फूल चुनने जाते है और अस्थि को एक लोटे में रख देते है। एक साल बाद उस लोटे को गंगा में बहा देते है। दरअसल ये उस ज़माने के रीतिरिवाज है जब आधुनिक तकनीक नहीं थी। इसलिए लोग अपने अज़ीज़ों की काफ़ी दिनों तक अपने पास एक ऐसी चीज़ रखते थे जो उनकी मौत को झुठला सके। लोग राख रखते थे। राख यानि याद के रुप में एक ठोस चीज़ जिसे आप अपने पास संभाल कर रख सकते हो।तस्वीर पर पड़ी माला उसी अनुष्ठान का दृश्य रूपक है।

शोला था जल बुझा हूँ हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएं मुझे न दो।
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सुनने की शर्त

दीवार 1975

इस सीन में बडे भाई ने छोटे भाई को सुनने के लिए बुलाया है .वो बस सुनने आया है . ऐसा लगता है अपनी तरफ से उसे कुछ नहीं कहना है . उसके शरीर मे इंतज़ार का एक भाव है .लेकिन उसके इंतज़ार में एक बेचैनी है . बेचैनी इसलिए की वो जनता है कि वो क्या सुनने आया है ?बेचैनी इसलिए नहीं की उसे कोई हैरत होने वाली है .गौर करने वाली बात ये है कि वो तब तक नहीं बोलता है जब तक सवाल नहीं पुछा जाता .वैसे भी रिश्तों के सारे पुल टूट चुके हैं .इसी पुल के बहाने सुनने की जगह की तरफ भी अपने भाई को इशारा करता है। अमिताभ कहता है कि ”हम कहीं और नहीं इसी पुल के नीचे ही मिल सकते थे ”.
सुनने की एक जगह भी होती है.जो बात इस बार भाई कहना चाहता है वो यहीं कही जा सकती हैं — और यहीं सुनी भी जा सकती है. एक भरपूर भावुक सेटअप तैयार किया गया है .

पर सुनने का प्रमाण देने के लिए बोलना ज़रूरी होता है. अगर प्रतिक्रिया नही देंगे तो कैसे पता चलेगा की आप सुन रहे हो?
शशी कपूर आपने बॉडी –हाथों से, चाल से ,और नज़र न मिला के वो अपनेको disinterested listener बतला रहा है.

अमिताभ पूछता है/प्रतिक्रिया चाहता है कि सुनने मे भाई को दिलचस्पी है भी की नहीं .वो कहता है कि ”मैं किससे बात कर रहा हूँ .
लेकिन आज ‘दोनों कहना चाहते थे’
‘दोनों सुनाना चाहते थे’ . सुनने के लिए आज कोई नहीं आया।

कौन कहेगा, कौन सुनेगा में एक पारंपरिक हायरार्की तो है ही जो बड़े भाई और छोटे भाई में होती है, शशि कपूर की तलहथियोँ की कसमसाहट उस असंतोष से भी निकलती है। हाथ पीठ पर बँधे हैं, लेकिन सम्मान में नहीं।

सुनने वाले को तैयार करना सुनाने वाले की ज़िम्मेदारी है .

Mr. Natwarlal ( 1979 )

हर जगह जिसको सुनाना है वो सुनने वाले को तैयार करता है। सुनाने वाला सुनने वाले का ध्यान अपनी ओर खींचता है। सुनने वाले के कान खुले हुए है। पूरे वातावरण में जितनी भी ध्वनियां है, जितनी भी आवाज़ें आ रही है वो सुनने वाले के कानों में जा रहा है पर ये जो सुनाने वाला है वो कह रहा है कि सिर्फ़ मेरी ध्वनियां सुनो। वो कहता है सुनने वाले से कि सुनते हुए तुम चुनाव करो कि तुम्हें क्या सुनना है। दरअसल सुनाने वाला चाहता है कि सुनने वाला वही सुने जो मैं कह रहा हूं इसलिए पुराने ज़माने में डुग-डुगी बजाई जाती थी,और अब अनाउंसमेंट होते थे। दरअसल सुनने वाला कुछ भी सुनने को तैयार रहता है लेकिन सुनने वाला सिर्फ़ वही सुनने को तैयार नहीं है जो आप सुनाना चाहते हो। ध्यान रहे कान एक खुला ऑबजेक्ट है, आंखें आप बंद कर सकते हो। कानों को बंद करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा यानी उंगलियां डालनी होती है। इस गाने में बच्चा जब टोकता है – आप तो जिंदा है, आगे भी सुनाओ तो ये कहानी – गाना एक माहौल बनाने में और अपनी ही यादों की दुनिया में घूमने में मदद करता है। बच्चे को ‘फिर क्या हुआ’ इसमें दिलचस्पी है।विहंगम पटल पर एक कविता भी इसी उत्सुकता पर है
फिर क्या होगा उसके बाद
फिर क्या होगा उसके बाद,
उत्सुक होकर शिशु ने पुछा
माँ क्या होगा उसके बाद?
यहां श्रोता मंत्रमुग्ध नहीं है। उसका अपना ज़ेहन है और अपना फोकस। यही दिमाग और यही फोकस कहानीनुमा गीत में एक संवाद की गुंजाईश पैदा करती है।