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word of the week : हुड़दंग

हुड़दंग

भीड़ में ही हुड़दंग संभव है। इसमें शरीर और आवा‌ज़ों की बेतरतीब गतियाँ हैं। इसमें एक क़िस्म की नक़ारात्मक छवि है, जो उस स्थान की तात्कालिक व्यवस्था को चुनौती देती है। अफरातफरी, हड़बड़ी और कहीं – कहीं भगदड़ इसका अहम हिस्सा है। इसमें उन्माद के साथ एक – दूसरे से होड़ और हैरानी का भाव भी चिपका रहता है। ये जगह में इतर से बितर और बितर से इतर होने वाली आवाज़ है, यानि एक जगह नहीं रहती।सुनने और देखने वाले के लिये ये दहशत भरा नज़ारा पेश करती है। हुड़दंग की आवाज़ें स्वभाविक इंसानी आवाज़ें नहीं हैं। ये आवाज़ों की भगदड़ है और ये आवाज़ों के अनुशासन को नकारती है।

word of the week : सन्नाटा

सन्नाटा

सन-सन की आवाज़ से पैदा हुआ ख़ामोशी का यह पर्याय कितना दिलचस्प है! ‘मुर्दा शांति’ या ‘पिन ड्रॉप सायलेन्स’ को भी अभिव्यक्ति के लिए आवाज़ की ज़रूरत होती है। सन्नाटा यानि जब आवाज़ों का अभाव इतना तीखा हो कि उसका अहसास आप पर भारी पड़ जाए। ऐसी ख़ामोशी जहाँ आप अपनी हरकत को ही सुनने लगें। इतनी अविश्वसनीय कि कोई भुतहा मौजूदगी प्रतीत होने लगे। शहरों में ऐसे मौक़े कभी आते हैं क्या?

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word of the week: आहट / aahat

आहट / aahat

ये आवाज़ का एक अहसास है। किसी छोटी- सी हरकत या गति से पैदा होती है। अपने हल्केपन के कारण साफ़ सुनने के रेंज से नीचे ही रहती है। आहट सुनने के लिए चौकन्ना होना पड़ता है। इसमें यथास्थिति के टूटने का भाव है। सुनने वाले के लिये आहट चौंकाती है या राहत देती है। कुछ आहटें जानी-पहचानी होती हैं, कुछ बिल्कुल नई। ऐसी स्थिति में आहट क़यास या अनुमान का कारण बनती है – क्योंकि आहट में दृश्य तत्व नहीं होता।

Translation: Sound almost below threshold of hearing, so soft it is sensed more than heard.

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word of the week: कर्कश आवाज़

कर्कश आवाज़

कर्कश आवाज़ को कान झेलते हैं। कर्कश आवाज़ में क्या कहा जा रहा है, उसे समझने से पहले उसके अंदाज़ और उसका वॉल्यूम से दिमाग अटक जाता है। ये मधुर आवाज़ का विलोम है। ये आवाज़ किसे पसंद है ? शायद उसको भी नहीं जों इसका इस्तेमाल करता है।

यशोदा

translation: a hoarse/grating voice

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word of the week: सिसकियाँ

सिसकियाँ

बहुत तेज़ रुलाई के फूटने के साथ और आँसूओं के सूख जाने के बाद ये उभरती है। खामोशी और सन्नाटे के बीच ये डूबी-दबी-चिपकी हुई बड़ी रुलाई की छोटी बहन है। ये निज़ी है और दबाव को कम करने के इशारे के साथ होती है। ये नाक के हकलाने से ज़िंदा होती है और सांस के अंदर जाते ही मर जाती है। ये छाती से ऊपर के हिस्से में कंपन को जन्म देती है। ये छोटी उम्र की मेहमान है। अकेलेपन को पूरी तरह से भुनाती है। ये आंतरिक अहसासों के साथ होती है।

translation: soft sobbing – a sound from inside the body as feelings tighten and release the breath

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word of the week: कराहना

कराहना

यह शरीर के असहय दर्द के संकेत की अस्पष्ट आवाज़ है जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कराहने वाला शारीरिक पीड़ा और तड़प में है। कराहना बिना शब्दों के शरीर की आवाज़ है। कराहने में बड़बड़ाने की भी परछाई आवाज़ छुपी है।

translation: groan – the inarticulate rattle of the body voicing pain

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word of the week: हुल्लड़

हुल्लड़

यानि जब युवा समुह अपने पूरे जोश और मज़े को आवाज़ों की तेजी से व्यक़्त करता है। इसमें आवाज़ें और शरीर दोनों ही एक साथ काम करते हैं। हुल्लड़ ‘हल्ला’ को शारीरिक भाषा में ले आने का भी शब्द हैं। जैसे – हल्ला मचाना और हुल्लड़ करना कथनी से करनी की ओर ले जाता है जिसमें आवाज़ पूरे शरीर की मस्ती को व्यक़्त करती है। शायरों नें इसे जवानी की आवाज़ भी कहा है।

Hard to translate: ‘Hullad’ is the collective noise of a group of 5-6 rowdy young men celebrating.

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word of the week: कानाफूसी

कानाफूसी

कानाफूसी यानि कानों में फुस -फुसा-हट। ये मुँह से और मुँह के नजदीक कानों को जोड़ने वाली आवाज़ है। कई बार ये एक ही शख़्स तक सीमित नहीं रहता पर स्वर की मात्रा/आवाज़ों की ऊँचाई-निचाई/उतार-चढ़ाव उतनी ही रहती है जितना दो के लिए चाहिए। यहां कान महत्वपूर्ण है यानि पूरी कोशिश इसमें रहती है कि आवाज़ कान के बाहर न जाए। कानाफूसी अफवाह, साजिश, गॉसिप और चुगली के संदर्भ में ज़्यादा इस्तेमाल होता है। इसमें आवाज़ों की अस्पष्टता और हड़बड़ाहट की वजह से नये अर्थ गढ़ने की संभावनाएं ज़्यादा रहती है।

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word of the week: चिल्ल पों

चिल्ल पों

चीख़-पुकार के नजदीक का शब्द है, पर ये मारपीट या करुणा वाले संदर्भ से अलग है।
चिल्ल पों – यानि आवाज़ों की आपाधापी जिसके ऊपर जाकर आपको अपनी आवाज़ दर्ज करनी है।
चिल्ल पों वाली आवाज़ सत्ता या किसी भी एक शख़्स की तरफ़ केंद्रित या सम्बोधित नहीं होती बल्कि ये आपस में ही उलझी हुई आवाज़ें हैं और इन सारी आवाज़ों की दिशा बेतरतीब होती है। बचपन के संदर्भ में इस शब्द का ज़्यादा इस्तेमाल होता है। ये एक दूसरे पर चढ़ी हुई आवाज़ों का ढेर है।

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