रेलवे रोड ब्रिज / नांगलामाची बस स्टैंड

railwayroadbridge-trafficशहर अगर कुछ देर के लिए रुक भी जाये तब भी वह शांत नहीं होता। बीच-बीच में धकेलने की सुई सी उठती और फिर एक चीख के साथ बंद हो जाती। हर आवाज़ एक से बढ़कर एक ड़िमांड करती जितना चिल्ला सकती चिल्लाती, दूर तलक गूँजती और फिर रूक जाती। रास्ता दो नहीं तो चीख पड़ेंगे। सब कुछ उसी में खोकर कहीं रह जाता। इस धमकी को यहाँ मानता कौन है। आवाज़ें यहाँ पर धमकियाँ ही तो देती हैं। Continue reading

डेली पैसेंजर – सराय काले खाँ

listeners at work at busy bus stopशहर लोगों की आवाज़ों को खा जाता है। चलती–रुकती बसें जहाँ लोगों को अपनी ओर खींचती हैं वहीं उन्हें अपने में समा भी लेती हैं। यहाँ आवाज़ों में उनकी गति का अहसास अपने आप ही होने लगता है। आवाज़ों की दौड़ और एक दूसरे से जुगलबंदी करता नजर आता है। आँखें सड़क पर खालीपन की खामोशी को महसूस करती है तो दूसरी तरफ़ कान आवाज़ों की चहलकदमी को थाम लेते हैं।

शहर के अंदर और बाहर लोगों के आने–जाने के रास्ते भले ही दूर–दूर हों लेकिन यहाँ पर रुकना और फिर दौड़ जाना इस जगह के घनेपन को हमेशा मजबूत रखता है। यह चीख–पुकारों का इलाका है। ऐसी चीख–पुकार जो लोगों को भागने ही नहीं देती। अपने में डूबा लेती है। Continue reading

नेहरू प्लेस का आवाज़नामा

Mickey Virus 2013

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ज़रूरत है कुछ पल ठहरकर और कान लगा कर सुनने की। गूंज तैयार हो रही है जरा चौकन्ने रहिये। लम्बी-लम्बी लचीली झाडूओं से, जमीन पर पड़े कूड़े को साफ करते कर्मचारी। मोटर साईकिलों, स्कूटर और कार पार्क करते शख़्स अपने दफ़्तरों की ओर जा रहे हैं। सुबह के इस मंजर में दाखिल होते ही जहां पर चारों तरफ से खुले रास्ते और पहली बार अपनी दस्तक देकर सन्नाटे से भरी जगह को तारों -ताजा कर रहे हैं।

नेहरू प्लेस के इस बाज़ार का सवेरा यहाँ की दुकानों के सटर और इस पूरी जगह से कागज़, पोलिथीन, प्लास्टिक चाय के कप, गत्तो के डिब्बे और कपड़ों के बड़े बड़े गट्ठरों के खुलते ही पता चलता है।

इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक समानों के रख – रखाव से दुकानों के बाहर जो ध्वनियाँ घूमती है उनके होने से यहाँ की आबोहवा बनती है।

तिरपाल को खड़ा करते हुए अपने -अपने हिस्से का कोना बनाते लोग। कपड़े, चाइनीज़ खिलौने, बैग की पैकिंग खोल रहे हैं। ये सब पटरी वाले अपनी – अपनी दुकान को व्यवस्थित करने में लगे हैं।

चारों तरफ न्यूज़ चैनलो और गानों की गर्मागर्मी के साथ सांस छोड़ते खिड़कियों पर लगे AC। इनके पुराने होने का पता उनके चलने की आवाज़ से पता चलता है। कागज़ो का फड़फड़ाना, सीढ़ियों के नीचे डिब्बों को खिसकाना और अटकना, पॉलीथिनों का यहां से वहां होना। एक आवाज़ पैदा करते हैं। लग रहा है जैसे एक चीज दूसरी चीज से बातें कर रही है।

आप इस जगह को तकनीकी चीजों की मंडी भी कह सकते हैं। कंप्यूटर और मशीने छोटी-बड़ी, नई-पुरानी, असली- नकली, खमोश, चीखती और अपने होने का अहसास कराती है। हर तरह की चीजों के यहां दाम तय किये जाते हैं और पल-पल बदलते भी रहते हैं।

सजी सवरी एक चाईना बाज़ार के खिलौने की दुकान जहां चाबी से चलने वाला गुड्डा चल रहा है रेडियो ट्रांजिस्टर। हैलीकॉप्टर, हवाईजहाज, रिमोट से चलने वाली कार, नाइट लेंप, क्रैन, रेलगाड़ी, डोरबेल, मच्छर मारने का रैकेट और भी बहुत कुछ ….

इस जगह में इतनी अफ़रातफरी रहती है कि किसी को ठहर कर सुन पाना मुश्किल सा लगता है। मगर खास बात ये है की यहाँ इतनी खींचातानी होने के बाद भी बाज़ार में अपनी तरफ आकर्षित करती ध्वनियाँ यहाँ से गुजरने वालों को पुकारती हैं।

“सॉफ्टवेयर सीडी”

“सॉफ्टवेयर सीडी गेम”

“सॉफ्टवेयर सीडी गेम”

और जब तक उसकी तरफ नज़र चली ना जाये वो पुकारना बंद नहीं होता। मानो ये आवाज़ पीछा कर रही हो। अगर पलट आवाज़ों के इस कौतूहल को सुना जाए तो ये एक प्रसारण के जैसा ही लगेगा।

राकेश

थके कान

कहते हैं रात दिनभर की सारी आवाज़ों को अपनी खामोशी में छुपा लेती है। पर क्या सच में रात खामोश होती है? तकरीबन रात के पोने एक का वक्त है। मैं अभी अभी अपने काम पर से लौट कर कमरे में दाख़िल हुआ हूँ। पूरा कमरा गर्म भाप से भरा हुआ है। दरवाजा खोलते ही लगा जैसे दिनभर की खामोशी अब टूट जायेगी। एक पल ऐसा लगा की बंद दरवाजें के पीछे कई आवाज़ें पहले से ही छुपी हुई हैं। सब कुछ बोल रहा है। दिवारें, दिवार पर लटकी घड़ियां, घड़ियों में लंगड़ाकर चलती सूइयां, तस्वीरें, उनमें छुपी यादें, कमरें की कुर्सियां, उनकी गद्दियां, पलंग और उसपर रखे तकिये। सभी कुछ मुझसे बातें करने की कोशिश में है। कुछ भी शांत नहीं है। दरवाजें आपस में अड़ंगी देकर एक दूसरे को अपने से अलग कर रहे हैं और कमरे के भीतर खेलती हवा सबको छेड़ रही है। सुस्त हवा की अपनी कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती मगर वो जिसको भी छू लेती वही बोल पड़ने की फिराक में है। कमरे में झिगूरों की आवाज़ें हैं। लगता है जैसे वो मेरे आने से पूरी तरह से नराज़ है। मुझे डरा रहें हैं।

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word of the week : हुड़दंग

हुड़दंग

भीड़ में ही हुड़दंग संभव है। इसमें शरीर और आवा‌ज़ों की बेतरतीब गतियाँ हैं। इसमें एक क़िस्म की नक़ारात्मक छवि है, जो उस स्थान की तात्कालिक व्यवस्था को चुनौती देती है। अफरातफरी, हड़बड़ी और कहीं – कहीं भगदड़ इसका अहम हिस्सा है। इसमें उन्माद के साथ एक – दूसरे से होड़ और हैरानी का भाव भी चिपका रहता है। ये जगह में इतर से बितर और बितर से इतर होने वाली आवाज़ है, यानि एक जगह नहीं रहती।सुनने और देखने वाले के लिये ये दहशत भरा नज़ारा पेश करती है। हुड़दंग की आवाज़ें स्वभाविक इंसानी आवाज़ें नहीं हैं। ये आवाज़ों की भगदड़ है और ये आवाज़ों के अनुशासन को नकारती है।

word of the week : सन्नाटा

सन्नाटा

सन-सन की आवाज़ से पैदा हुआ ख़ामोशी का यह पर्याय कितना दिलचस्प है! ‘मुर्दा शांति’ या ‘पिन ड्रॉप सायलेन्स’ को भी अभिव्यक्ति के लिए आवाज़ की ज़रूरत होती है। सन्नाटा यानि जब आवाज़ों का अभाव इतना तीखा हो कि उसका अहसास आप पर भारी पड़ जाए। ऐसी ख़ामोशी जहाँ आप अपनी हरकत को ही सुनने लगें। इतनी अविश्वसनीय कि कोई भुतहा मौजूदगी प्रतीत होने लगे। शहरों में ऐसे मौक़े कभी आते हैं क्या?

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word of the week: आहट / aahat

आहट / aahat

ये आवाज़ का एक अहसास है। किसी छोटी- सी हरकत या गति से पैदा होती है। अपने हल्केपन के कारण साफ़ सुनने के रेंज से नीचे ही रहती है। आहट सुनने के लिए चौकन्ना होना पड़ता है। इसमें यथास्थिति के टूटने का भाव है। सुनने वाले के लिये आहट चौंकाती है या राहत देती है। कुछ आहटें जानी-पहचानी होती हैं, कुछ बिल्कुल नई। ऐसी स्थिति में आहट क़यास या अनुमान का कारण बनती है – क्योंकि आहट में दृश्य तत्व नहीं होता।

Translation: Sound almost below threshold of hearing, so soft it is sensed more than heard.

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